मुसाफिर
मुसाफिर
अनजान मुसाफिर तुम भी हो,
अनजान मुसाफिर हम भी हैं।
अनजान डगर ये क्या जाने,
इस रस्ते पे कहीं एक मंजिल भी है।
सरिता की धारा को हमने,
क्या यूं ही बहते देखा है ?
जल की धारा क्या जाने हैं,
इस रस्ते पर कहीं एक मंजिल भी है।
अनजान निशाना को आखिर,
कब तक तुम यूं ही साधोगे ?
तीर भी बेचारा क्या जाने,
आखिर कहां तुम्हारी एक मंजिल भी है ?
अनजान मुसाफिर तुम भी हो,
अनजान मुसाफिर हम भी हैं।
अनजान डगर ये क्या जाने,
इस रस्ते पे कहीं एक मंजिल भी है।
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