प्यास

प्यास


कब तक मुस्कुराती वो नन्हीं मुस्कान,

क्योंकि वक्त को बदलना ही मंजूर था।

और,

वक्त के थपेड़ों ने नन्ही मुस्कान छीन ली।

अब वह तन्हाईयों के घेरे में जीवहीन काया बनीं,

एैसा तांडव देख रही है जिसमें,

वाद विवाद बन गए हैं।

इस धरोहर के भाग बन गए हैं।


यहां की मिट्टी प्यास से व्याकुल,

पानी का इंतजार कर रही है।

मगर, 

उस बूंद भर पानी से सिर्फ आग का बुझना मंजूर था,

प्यास का बुझना नहीं। 

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